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कर्मण्येवाधिकारस्ते: अर्थ व पूरा श्लोक (गीता 2.47)

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता 2.47) का शुद्ध पाठ, शब्द-दर-शब्द अर्थ, भावार्थ, निष्काम कर्म का रहस्य और जीवन में इसे अपनाने के तरीके — सरल हिंदी में।

संस्कृत कला11 जुलाई 20263 मिनट
श्लोककर्मण्येवाधिकारस्तेमा फलेषु कदाचन❀ संस्कृत कला
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भगवद्गीता का यह श्लोक शायद सबसे अधिक सुना-पढ़ा गया है। कुरुक्षेत्र के मैदान में मोह और चिंता से घिरे अर्जुन को श्रीकृष्ण कर्म का सबसे गहरा रहस्य इसी एक पंक्ति में बता देते हैं — कर्म करो, पर फल की चिंता छोड़ दो।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.47

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣu kadāchana, mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stv akarmaṇi

शब्द-दर-शब्द अर्थ

शब्दअर्थ
कर्मणि एवकेवल कर्म में
अधिकारः तेतुम्हारा अधिकार है
मा फलेषु कदाचनफलों में कभी नहीं
मा कर्मफलहेतुः भूःकर्म के फल का कारण (हेतु) मत बनो
मा ते सङ्गः अस्तु अकर्मणिकर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो

सरल अर्थ

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए न तो फल की कामना से कर्म करो, और न ही कर्म न करने (आलस्य) में तुम्हारी आसक्ति हो।

भावार्थ — श्रीकृष्ण क्या समझा रहे हैं

हम अक्सर परिणाम की चिंता में इतने डूब जाते हैं कि काम ही ठीक से नहीं कर पाते। परीक्षा से पहले का डर, नतीजे की घबराहट, "क्या होगा" की उलझन — यही मन की शक्ति बिखेर देती है। गीता कहती है: अपना सर्वश्रेष्ठ दो, और फल को समय पर छोड़ दो।

इस श्लोक में तीन बातें छिपी हैं:

  • कर्म पर ध्यान दो, परिणाम पर नहीं — जो आपके हाथ में है, उस पर पूरी शक्ति लगाओ।
  • फल की आसक्ति तनाव लाती है — कर्तव्य-भाव से किया कर्म शांति देता है।
  • आलस्य भी आसक्ति है — काम से भागना समाधान नहीं; निष्क्रियता में सुख ढूँढना भी बंधन है।

निष्काम कर्म का रहस्य

इसी श्लोक से गीता का प्रसिद्ध सिद्धांत "निष्काम कर्म" निकलता है — फल की आसक्ति के बिना कर्तव्य करना। इसका अर्थ यह नहीं कि लक्ष्य न रखो या लापरवाह हो जाओ। अर्थ यह है कि लक्ष्य की ओर पूरी लगन से बढ़ो, पर परिणाम को कसकर मत पकड़ो। जब मन फल की पकड़ ढीली करता है, तभी वह सबसे स्थिर, निर्भय और शक्तिशाली होता है।

एक आम भ्रम

कुछ लोग सोचते हैं कि इसका मतलब है "मेहनत का फल नहीं मिलेगा" या "इच्छा रखना पाप है"। ऐसा नहीं है। श्लोक फल को नकारता नहीं — वह फल की चिंता व आसक्ति को हटाकर कर्म को शुद्ध और शक्तिशाली बनाता है।

जीवन में कैसे उतारें

  • परीक्षा/पढ़ाई: तैयारी आपके हाथ में है, अंक कई बातों पर। पूरी मेहनत करें, नतीजे की घबराहट छोड़ें।
  • नौकरी/काम: अपना काम ईमानदारी से करें; पदोन्नति या तारीफ़ को लक्ष्य नहीं, परिणाम मानें।
  • रिश्ते: प्रेम और कर्तव्य निभाएँ, बदले की अपेक्षा में मन मत उलझाएँ।

आज से एक अभ्यास

कोई भी काम शुरू करने से पहले एक पल रुकें और मन में कहें — "मेरा काम पूरी मेहनत से करना है, बाक़ी समय पर।" यही इस श्लोक का जीवंत रूप है।

इससे जुड़े श्लोक

  • गीता 2.48 — "समत्वं योग उच्यते" (सफलता-असफलता में समभाव ही योग है)।
  • गीता 3.19 — आसक्ति छोड़कर निरंतर कर्तव्य करने का उपदेश।

अपनी स्थिति के अनुसार गीता का ऐसा ही कोई और श्लोक खोजना हो — जैसे तनाव, भय या निर्णय के लिए — तो हमारा ऐप आपके लिए सही श्लोक ढूँढ देगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्मण्येवाधिकारस्ते श्लोक गीता के किस अध्याय में है?

यह श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय (सांख्ययोग) का 47वाँ श्लोक है — गीता 2.47।

कर्मण्येवाधिकारस्ते का सरल अर्थ क्या है?

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म (कर्तव्य) करने में है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए फल की इच्छा से कर्म मत करो, और कर्म न करने में भी आसक्ति मत रखो।

क्या इसका अर्थ है कि हमें लक्ष्य या सफलता की इच्छा नहीं रखनी चाहिए?

नहीं। श्लोक लक्ष्य रखने से नहीं रोकता — यह फल की चिंता और आसक्ति छोड़ने को कहता है। लक्ष्य तय करें, पूरी लगन से कर्म करें, पर परिणाम की पकड़ में तनाव न लें।

निष्काम कर्म क्या है?

बिना फल की आसक्ति के, कर्तव्य समझकर किया गया कर्म ही निष्काम कर्म है। यही इस श्लोक का मूल संदेश है और यही गीता के कर्मयोग का आधार है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएँ?

हर काम में अपना सर्वश्रेष्ठ दें और परिणाम समय व ईश्वर पर छोड़ दें। परीक्षा, नौकरी या रिश्ते — जहाँ मेहनत आपके हाथ में है और नतीजा कई बातों पर निर्भर है, वहाँ यह सूत्र मन को शांत और एकाग्र रखता है।

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