श्लोक

यदा यदा हि धर्मस्य: सम्पूर्ण श्लोक, अर्थ व सन्देश (गीता 4.7)

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत — गीता 4.7 व 4.8 का सम्पूर्ण श्लोक, शब्द-दर-शब्द अर्थ, भावार्थ और जीवन का सन्देश। श्रीकृष्ण के अवतार का वचन, सरल हिंदी में।

संस्कृत कला21 जुलाई 20263 मिनट
श्लोकयदा यदा हि धर्मस्यसम्भवामि युगे युगे❀ संस्कृत कला
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भगवद्गीता का यह श्लोक सबसे अधिक उद्धृत और प्रिय श्लोकों में से एक है। इसी में श्रीकृष्ण अपने अवतार लेने का रहस्य प्रकट करते हैं — कि जब भी संसार में अधर्म बढ़ता है, ईश्वर स्वयं धर्म की रक्षा के लिए आते हैं। यह वचन दो श्लोकों (गीता 4.7 और 4.8) में पूरा होता है।

सम्पूर्ण श्लोक

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

श्रीमद्भगवद्गीता · 4.7

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata, abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmy aham

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

श्रीमद्भगवद्गीता · 4.8

paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśāya cha duṣkṛtām, dharma-saṁsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge

शब्द-दर-शब्द अर्थ

शब्दअर्थ
यदा यदा हिजब-जब
धर्मस्य ग्लानिःधर्म की हानि
भवति भारतहोती है, हे भारत (अर्जुन)
अभ्युत्थानम् अधर्मस्यअधर्म की वृद्धि
तदा आत्मानं सृजामि अहम्तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ
परित्राणाय साधूनांसज्जनों की रक्षा के लिए
विनाशाय च दुष्कृताम्और दुष्टों के नाश के लिए
धर्मसंस्थापनार्थायधर्म की स्थापना के लिए
सम्भवामि युगे युगेमैं युग-युग में जन्म लेता हूँ

भावार्थ

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — जब-जब इस पृथ्वी पर धर्म का पतन होता है और अधर्म सिर उठाने लगता है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ। और वे इसका उद्देश्य भी बताते हैं: सज्जनों की रक्षा, दुष्टों का नाश, और धर्म की पुनः स्थापना — और यह किसी एक बार नहीं, बल्कि हर युग में होता है।

तीन गहरे सन्देश

  • अधर्म पर धर्म की विजय निश्चित है। अन्याय चाहे कितना भी बलवान क्यों न लगे, वह सदा नहीं टिकता।
  • ईश्वर निष्क्रिय नहीं हैं। जब संतुलन बिगड़ता है, तो सृष्टि स्वयं उसे संभालने की शक्ति रखती है।
  • धर्म की रक्षा सामूहिक ज़िम्मेदारी है। "अवतार" केवल बाहर नहीं — जब कोई व्यक्ति सत्य और न्याय के लिए खड़ा होता है, तब भीतर भी धर्म जागता है।

दशावतार से जुड़ाव

यही वचन भगवान विष्णु के दशावतारों का आधार है — राम, कृष्ण आदि रूपों में ईश्वर का बार-बार आना। हर अवतार इसी प्रतिज्ञा की पूर्ति है: "सम्भवामि युगे युगे।"

आज के जीवन में

कठिन और निराशाजनक समय में यह श्लोक अपार साहस देता है। जब चारों ओर अन्याय दिखे, तब यह याद दिलाता है कि अंधकार स्थायी नहीं। और यह भी सिखाता है — धर्म की रक्षा का इंतज़ार मत करो, स्वयं उसका माध्यम बनो।

ध्यान दें

यह श्लोक अक्सर "यादा याद ही धर्मस्य" जैसे गलत उच्चारण में लिखा मिलता है। शुद्ध रूप है — "यदा यदा हि धर्मस्य"

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यदा यदा हि धर्मस्य श्लोक गीता के किस अध्याय में है?

यह श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) के श्लोक 7 और 8 हैं — गीता 4.7 और 4.8।

यदा यदा हि धर्मस्य का अर्थ क्या है?

जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) स्वयं को प्रकट करता हूँ — सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के नाश और धर्म की स्थापना के लिए, हर युग में।

यह श्लोक किसने और किससे कहा?

यह श्लोक स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन से कहा था, जब उन्होंने अपने अवतार लेने का रहस्य समझाया।

यदा यदा हि धर्मस्य का सम्पूर्ण श्लोक क्या है?

यह दो श्लोकों में पूरा होता है — 'यदा यदा हि धर्मस्य...तदात्मानं सृजाम्यहम्' (4.7) और 'परित्राणाय साधूनां...सम्भवामि युगे युगे' (4.8)।

इस श्लोक का मुख्य सन्देश क्या है?

अधर्म चाहे कितना भी बढ़ जाए, अंततः धर्म की ही विजय होती है। यह कठिन व अंधकारमय समय में आशा और विश्वास का सन्देश है।

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